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Women’s Day 2021: आज विश्व महिला दिवस है और हमारे सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।

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विश्व महिला दिवस पर आज आपके समक्ष एक ऐतिहासिक कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ।

ऐसी धारणा बन गई है या बनाई जा रही है कि सनातन धर्म में स्त्रियों को उचित सम्मान एवं शिक्षा का अधिकार नहीं और वे दूसरे दर्ज़े की मानी जाती हैं। इसी धारणा को तोड़ने के लिए हम आज भारती की कथा प्रस्तुत कर रहे हैं। वैदिक काल में हालांकि अनेक विदुषियों यथा गार्गी, मैत्रेयी आदि अनेकों विदुषियों का उल्लेख मिलता है, किन्तु हम आज बिहार की एक विदुषी नारी भारती की कथा प्रस्तुत करना चाहते हैं जिन्होंने शंकराचार्य को भी पराजित किया था।

कथा की शुरुआत कुछ इस तरह से है कि मिथिला में एक प्रकांड बौद्ध विद्वान कुमारिल भट्ट थे। उनके समय में बौद्धों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था एवम सनातन धर्म की अवनति हो रही थी। ऐसे में कुमारिल भट्ट ने सनातन धर्म के उद्धार का प्रण किया। बिना बौद्ध धर्म ग्रन्थों को पढ़े ऐसा करना मुश्किल था, अतः कुमारिल भट्ट बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गए।

उन्होंने बौद्ध धर्म के समस्त ग्रन्थों का सांगोपांग अध्ययन कर एवम बौद्ध धर्म की समस्त जानकारी प्राप्त की।
इसके बाद उन्होंने बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ की चुनौती दी। बौद्ध धर्म के सारे आचार्य इस शास्त्रार्थ में बुरी तरह पराजित हुए एवम उन्होंने सनातन धर्म में पुनर्दीक्षा ली। ये एक महान घटना थी, जिसने सनातन धर्म की विजय पताका लहरा दी। ठीक इसी समय दक्षिण में शंकराचार्य भी सनातन धर्म के उद्धार के लिए प्रयत्नशील थे।

जगतगुरु आदि शंकराचार्य का जन्म 508 ईसा पूर्व केरल में हुआ था। वो कुमारिल भट्ट के समकालीन थे। अपनी धर्म यात्रा के मध्य उन्हें कुमारिल भट्ट नामक बौद्ध विद्वान की सूचना मिली तो वे कुमारिल भट्ट से शस्त्रार्थ करने चल पड़े। तात्कालीन नियमों के अनुसार गुरु से द्रोह अक्षम्य अपराध माना जाता था एवम इसकी सज़ा थी भूसे की अग्नि में आत्मदाह करना।

चूंकि कुमारिल भट्ट ने बौद्ध धर्म की शिक्षा प्राप्त कर अपने गुरुओं को ही शस्त्रार्थ में पराजित किया था, अतः उन्होंने भी भूसे की अग्नि ( तुषाग्नि ) में आत्मदाह करना स्वीकार किया। आदि शंकराचार्य जब कुमारिल भट्ट के पास पहुंचे तो कुमारिल भट्ट भूसे की अग्नि में आत्मदाह करने के लिए प्रविष्ट हो चुके थे। शंकराचार्य के द्वारा शस्त्रार्थ की चुनौती दिए जाने पर एवम उनके धर्म की पुनर्स्थापना के विचार जानकर, कुमारिल भट्ट ने उन्हें शुभकामनाएं देते उनका अभिनन्दन किया एवम कहा कि मैं इस समय आपसे शस्त्रार्थ करने लायक नहीं रहा। मिथिला में मेरा प्रिय शिष्य एवम उद्भट विद्वान मंडन मिश्र रहता है। आप वहां जाएं एवम उससे शास्त्रार्थ करें। उसकी पराजय ही मेरी पराजय होगी।

शंकराचार्य इसके बाद मिथिला के महिषी ग्राम पहुंचे एवम मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ की चुनौती दी। महिषी ग्राम ( प्रखंड ) सहरसा ज़िले में है और ज़िला मुख्यालय से 18 किलोमीटर पश्चिम- दक्षिण में स्थित है। कुमारिल भट्ट के अनन्य शिष्य एवम बौद्ध धर्म के उद्भट विद्वान मंडन मिश्र ने इस चुनौती को स्वीकार किया। मंडन मिश्र की पत्नी भारती भी एक विदुषी थीं। कहा जाता है कि मंडन मिश्र के तोते भी आगंतुकों से संस्कृत में वार्तालाप करते थे। दोनों की सहमति से इस शास्त्रार्थ की न्यायाधीश बनीं भारती। शास्त्रार्थ शुरू करने से पहले आदि शंकराचार्य ने एक शर्त रख दी कि, जो भी पराजित होगा वो दूसरे का शिष्य बनेगा। मंडन मिश्र ने इसे स्वीकार कर लिया।

शास्त्रार्थ शुरू हुआ और धर्मग्रंथों के उद्धरण दिए जाने लगे। शास्त्रार्थ चल ही रहा था कि भारती को किसी कार्य से बाहर जाना पड़ा। उन्होंने ताज़े फूलों की एक – एक माला दोनों को दी और कहा कि आप दोनों इसे धारण करें, तब तक मैं अपना कार्य सम्पादित कर आती हूँ। कुछ अंतराल के बाद जब भारती आईं तो उन्होंने आते ही अपने पति को पराजित घोषित कर दिया। शंकराचार्य ने तनिक आश्चर्य से पूछा कि देवि, आपने अपने पति को कैसे पराजित घोषित किया ? भारती का उत्तर था कि भगवन, जिस समय मैं गई थी तो ताज़े फूलों की माला आप दोनों को देकर गई थी।

आपके गले की माला के पुष्प ताज़े हैं जबकि मेरे पति के माला के पुष्प मुरझा गए हैं। इसका अर्थ है कि इन्हें क्रोध आ रहा था और जब तर्क हारता है तो क्रोध अवश्य आता है! शंकराचार्य ने भारती के सूझ-बूझ की अत्यंत प्रशंसा की। कहा जाता है कि ये शास्त्रार्थ 21 दिनों तक चला था। भारती ने अपने पति की पराजय के बाद शंकराचार्य से कहा कि आप तो ब्रह्मचारी हैं किन्तु मेरे पति विवाहित हैं एवम हमदोनो मिलकर एक अर्धनारीश्वर की धारणा बनाते हैं तो, अभी आपने आधे भाग को ही पराजित किया है।

आप पूर्ण विजय चाहते हैं तो अब मुझसे शास्त्रार्थ करें। अगले 21 दिन तक भारती एवम शंकराचार्य का शास्त्रार्थ चलता रहा, इसके बाद जब भारती को लगा कि वो पराजित हो जाएंगी तो उन्होंने शंकराचार्य से कामशास्त्र से सम्बंधित गूढ़ प्रश्न पूछने शुरू किए। कामशास्त्र को भी एक शास्त्र के ही रूप में मान्यता प्राप्त है। शंकराचार्य चूंकि बाल ब्रह्मचारी थे अतः वो उनके प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाए। उन्होंने थोड़े दिनों का अवकाश मांगा और कहा कि मैं जब वापस आऊंगा तो यहीं से शुरुआत करूंगा।

ऐसा माना जाता है कि उसी समय एक जवान राजा की मृत्यु हुई थी। शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश के द्वारा उस राजा के शरीर में प्रवेश किया एवम कामकला के सम्बंधित ज्ञान प्राप्त कर पुनः अपने शरीर में प्रवेश कर गए।
इसके बाद हुए शास्त्रार्थ में उन्होंने भारती द्वारा पूछे गए काम विषयक सभी प्रश्नों के उत्तर दिए और उन्हें पराजित किया। ये भारती की विद्वत्ता का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उन्होंने एक बाल ब्रह्मचारी को भी काम विषयक ज्ञान लेने के लिए विवश कर दिया।

दुःखद है कि महिषी में मंडन मिश्र या भारती से सम्बंधित कोई शिलालेख या जानकारी उपलब्ध नहीं!
उनका स्मारक भी नहीं है, एवम जहां उनकी कुटिया थी, उस जगह पर मिट्टी का ढूह है जिस पर एक स्मारक का निर्माण तो किया ही जा सकता है।

— प्रणव कर्ण ‘ स्वप्निल ‘

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